Friday, May 14, 2010

मन की व्यथा

मेरा मन करता विचरण, इस जग के अंधियारों में .
सुबक सुबक कर रोता रहता, उन यादों के गलियारों में.
सोचा करता रोज रात को, कल फिर एक नया सवेरा आयेगा.
बस एक रात का फासला और, कल शायद मुझे मेरा यार मिल जायेगा.
मन की इस हालत पर ये बेबस आँखे अक्सर रो दिया करती है .
जब वो इन आँखों से पूछा करता "क्या तुमने मेरे यार को देखा है?".