Thursday, September 30, 2010

परिंदे और दरिन्दे

ए खुदा यह हमने यह क्या कर दिया, अपने दिलों को हमने नफरत से भर दिया।
तेरे लिए दिल मैं जगह न बची, इस लिए हमने तुजे मंदिर मस्जिद मैं बैठा दिया।।
इस पत्थर की चारदीवारी के लिए हम लड़ बैठे, कत्लेआम हम अपनों का ही कर बैठे।
हमसे अच्छे तो वो परिंदे है, जो कभी मंदिर पे जा बैठे तो कभी मस्जिद पे जा बैठे ।।

Friday, May 14, 2010

मन की व्यथा

मेरा मन करता विचरण, इस जग के अंधियारों में .
सुबक सुबक कर रोता रहता, उन यादों के गलियारों में.
सोचा करता रोज रात को, कल फिर एक नया सवेरा आयेगा.
बस एक रात का फासला और, कल शायद मुझे मेरा यार मिल जायेगा.
मन की इस हालत पर ये बेबस आँखे अक्सर रो दिया करती है .
जब वो इन आँखों से पूछा करता "क्या तुमने मेरे यार को देखा है?".