Friday, May 14, 2010

मन की व्यथा

मेरा मन करता विचरण, इस जग के अंधियारों में .
सुबक सुबक कर रोता रहता, उन यादों के गलियारों में.
सोचा करता रोज रात को, कल फिर एक नया सवेरा आयेगा.
बस एक रात का फासला और, कल शायद मुझे मेरा यार मिल जायेगा.
मन की इस हालत पर ये बेबस आँखे अक्सर रो दिया करती है .
जब वो इन आँखों से पूछा करता "क्या तुमने मेरे यार को देखा है?".

5 comments:

  1. Indra ka blog!!!
    Macha raha hai londha..

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  2. छुप रही थी वो तेरी ठरकी निगाहों से
    और कह रही थी अबे जा मुह धो के आ

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  3. abe omi comment to kailas se pooch ke mat likh..

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  4. abe rehne de mera hi hai comment
    tujhe kya lagta hai tu or kailash ki kuch likh sakte hain kya

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